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अनुभूति में विशाल शर्मा की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
एक नदी बहती है
कुहासा
यादें

संकलन में-
दिये जलाओ- दीप माला

 

कुहासा

हर जगह
हर कहीं
फैला हुआ है कुहासा।
मानव को
मानवता से
दूर कर गया कुहासा।

सांप्रदायिक अलगाव
लूटमार, भेदभाव
सिखा कर गया कुहासा।

मिसाइल, आग्नेयास्त्र
नाभिकीय प्रक्षेपास्त्र
नए नए हथियार
देकर गया कुहासा।

कुहासा जो यम है
कुहासा जो तम है।
मिलकर शपथ लें
रघुकुल वचन दें
कोई दीप ऐसा जला दें।
धरा से कुहासा मिटा दें।।

२४ अक्तूबर २००४

 

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