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  सृजन – प्रक्रिया

बरसती है उमड़कर जब,
भाव रस की धार मन में,
शब्द बन बह जाते हृदय से
शिल्प की सब कल्पनाएं रीत जाती हैं अचानक
और हम स्वरों की झंकार में खुद तार बन कर
गीत गाते बिन स्वरों के
मौन पीते चाँदनी
खुद चाँदनी के तार बन कर।

सिद्धि से पहले सृजन की
तीव्र पीड़ा झेलना
आसान होता है भला क्या?
रोम–रोम काँच बन कर
टूटता है खनखनाकर
एक तीखा भँवर मन को और तन को
घेर लेता है अचानक
एक चुभन, तीव्र, मन में
गहरे… और गहरे
पैठती जाती निरंतर
और खुद संज्ञा जगत की
और अपनी और सबकी
शून्य होकर फैल जाती है हवा सी।
और हम…
भूले से, ठगे से देखते हैं
खुद से खुद का यह मिलन
रस नाद बन कर गूँजता है
रोम में… प्रति रोम में,
मौन के संगीत में
मन
डूबना तब चाहता है
गहरे
और
गहरे।।

१ मार्च २००५

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