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अनुभूति में कृष्ण मुरारी पहारिया की रचनाएँ-

गीतों में-
एक दिया
कविता पाठ वहीं
मन की धरती पर
मन तुम काजी हो या मुल्ला
मन तुम किसके रूप

 

मन तुम किसके रूप

मन तुम किसके रूप रचे हो
किसके बल पर इस दुनिया में
साबुत अभी बचे हो

क्यों अरूप में रूप देखते
बिम्बों में तस्वीरें
नहीं कल्पना पर थोपी क्यों
काया की प्राचीरें
भीतर कैसा स्रोत खुला है
जिसका रस पीते हो
सारी पीड़ा भूल गये हो
हँसी खुशी जीते हो

नहीं माँगते मान मनौबल
अपने आप लचे हो

घूम रहे निर्जन सड़कों पर
लेकिन नहीं उदासी
कैसा आज तुम्हारा
वृन्दावन, कैसा है काशी
किसकी मुरली गूँज रही है
इन गीतों छंदों में
कैसे तुमको लगा दीखने
ईश्वर इन बन्दों में

अब पहले से ठीक हो गये
मुझको बहुत जंचे हो

१५ अप्रैल २०१६

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