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अनुभूति में कृष्ण मुरारी पहारिया की रचनाएँ-

गीतों में-
एक दिया
कविता पाठ वहीं
मन की धरती पर
मन तुम काजी हो या मुल्ला
मन तुम किसके रूप

 

मन की धरती पर

मैंने तो मन की धरती पर
गीतों के सपने बोये हैं
ऊपर से उन्मन लगता हूँ
भीतर प्राण नहीं सोये हैं

प्राणों में सर्जन चलता है
और सदा चलता रहता है
जो भी देखा-सुना जगत में
बिम्बों में ढलता रहता है
जो अपने भीतर-ही-भीतर
कुंठा की गाँठें ढोता है
उसको कवि की कारगुजारी
पर विश्वास नहीं होता है

सारा वातावरण गुंजाने
के संकल्प नहीं खोये हैं

सर्जन सदा अकेले होता
यों काया पर दया सभी की
देखो कितने और चले थे
उनकी क्षमता चुकी कभी की
सर्जन में साहस लगता है
यह कायर का खेल नहीं है
अपना लोहू इसे दिया है-
यों ही रेलमपेल नहीं है

किसी तरह से अपने तन पर
दुनिया के बोझे ढोये हैं

१५ अप्रैल २०१६

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