अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. राकेश चक्र की रचनाएँ-

गीतों में-
अद्भुत संसार
आह्लाद कहाँ है
अविराम सफर
एक गुलाब खिला
जनतंत्र

 

जनतंत्र

यह कैसा जनतंत्र कि जिसमें
जनता ही रहती बेहाल

प्रजातंत्र में प्रजा निरर्थक
केवल शासन-तंत्र बचा है
उतनी उसकी पूछ यहाँ पर
जैसे नेता का चमचा है
आम आदमी के घर में तो
भीषण हाहाकार मचा है

परजा भूखी प्रजातंत्र में
नेता होते मालामाल

जो काले धन के स्वामी हैं
वे सबसे ज़्यादा सफ़ेद हैं
ऊपर चमक रहे हैं बरतन
किंतु तली में बहुत छेद हैं
जाति-धरम के भेदों में भी
पैदा करते नए भेद हैं

उतने वे रहते हैं निर्भय
जितनी होती तगड़ी ढाल

छल से, डर से या तिकड़म से
जब अपनी सरकारें आएँ
गुर्गों की नित नई जमीनें
कोठी-कारें बढ़ती जाएँ
उन पर लगी बदल दी जातीं
दंड-संहिता की धाराएँ

सज्जन डरे-डरे रहते हैं
हो जाता हर दुष्ट निहाल

१ अक्तूबर २०१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter