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अबके ऐसा दौर
एक मुद्दत से
उँड़स ली
खबर मिली है
जल गई है फ़सल

वो जब अपनी खबर

अंजुमन में-
दूर क्षितिज पर सूरज चमका
सीखो आँखें पढ़ना
हवा जब किसी की कहानी
हादसा हो जाएगा

  अब के ऐसा दौर

अब के ऐसा दौर बना है
हर ग़म काबिले-गौर बना है

उसके कल की पूछ मुझे, जो
आज तेरा सिरमौर बना है

फिर से चाँद को रोटी कहकर
आँगन में दो कौर बना है

बंद न कर दिल के दरवाजे
ये हम सब का ठौर बना है

इस्कूलों में आये जवानी
बचपन का ये तौर बना है

तेरी-मेरी बात छिड़ी तो
फिर किस्सा कुछ और बना है

झगड़ा है कैसा आखिर, जब
दिल्ली-सा लाहौर बना है

५ अप्रैल २०१०

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