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अनुभूति में गिरेन्द्र सिंह भदौरिया प्राण की रचनाएँ -

अंजुमन-
आग तो पी गया
पी गया वह पीर
ले चलता हूँ मैं
लेने लगीं अँगड़ाइयाँ
सपना था

 

सपना था

सो  जाता  तो भी सपना था
खो जाता  तो भी  सपना था 

हँसकर तेरा हो न सका मैं
हो जाता तो भी सपना था

सपना कब होता है सच्चा
हो जाता तो भी सपना था

पहले तो चलना ही मुश्किल  
जो जाता तो भी सपना था

साया बनकर आया था जो
वो जाता तो भी सपना था

हँसने का  देखा था सपना
रो जाता तो भी सपना था

चाहत  थी  तेरा  होने  की
हो जाता तो भी सपना था

दाग़ों  से  मैली  चादर  को
धो जाता तो भी सपना था

बीज नहीं बो सका प्यार के
बो  जाता तो भी  सपना था

जितना ढूँढा  उतना  उसमें 
खो  जाता तो भी सपना था 

बोझ जिसे मैं ढो न सका यूँ
ढो जाता तो भी सपना था

१ अप्रैल २०२३

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