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गिर रही है आँख से शबनम
जलते हैं दिल के ज़ख्म
ये तेरी जुस्तजू से
यों भी दर्दे गैर
यों मुसलसल जिंदगी से

अंजुमन में-
कड़ी है धूप
खोया है कितना

गजल कहूँ
दिल की हर बात
दिल मेरा
प्यार हमने किया
बिखरी शाम सिसकता मौसम
मुझको मिले हैं ज़ख्म
रखता नहीं है निस्बतें
वफ़ा का फिर सिला धोखा

  गजल कहूँ

रुख़ से ज़रा नक़ाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ
महफ़िल में इज़्तिराब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

इस आस में ही मैंने खराशें क़ुबूल की
काँटों से जब गुलाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए
तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

अँगड़ाइयों को आपकी मोहताज है नज़र
सोया हुआ शबाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

दर्दों की इंतिहा से गुज़र के जेहन में जब
जज्बों का इन्किलाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

तारे समेटने के लिए शोख़ फ़लक से
धरती से माहताब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

ठहरी है ग़म की झील में आँखें नदीश की
यादों का इक हुबाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

२ सितंबर २०१३

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