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गिर रही है आँख से शबनम
जलते हैं दिल के ज़ख्म
ये तेरी जुस्तजू से
यों भी दर्दे गैर
यों मुसलसल जिंदगी से

अंजुमन में-
कड़ी है धूप
खोया है कितना

गजल कहूँ
दिल की हर बात
दिल मेरा
प्यार हमने किया
बिखरी शाम सिसकता मौसम
मुझको मिले हैं ज़ख्म
रखता नहीं है निस्बतें
वफ़ा का फिर सिला धोखा

  मुझको मिले हैं जख्म

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से

आँखों का तेरी आँगन, कहीं हो न जाय तर
डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से

साहिल पे था न कुछ भी तेरी याद के सिवा
दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से

नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी
इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से

कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह
हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से 

२ सितंबर २०१३

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