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अनुभूति में डॉ. मधु प्रधान की रचनाएँ-

नये गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में

प्यासी हिरनी
सुमन जो मन में बसाए

गीतों में-
प्रीत की पाँखुरी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
सुलग रही फूलों की घाटी

अंजुमन में-
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
लबों पर मुस्कान

  मेरी है यह भूल अगर

मेरी है
यह भूल अगर
तो मुझको भूल प्यारी है
लिखना मेरी लाचारी है

दिखी किसी की सजल आँख तो
मेरे भी आँसू भर आये
पीड़ा की थपकी
पाकर ही
मन के बोल अधर पर आये
फिर भी पत्थर
नही पसीजे
आँसू का अर्चन जारी है।

सच  पूछूँ  तो  बुरा  लगेगा
बीज द्वेष के किसने बोये
पौधा बढ़कर वृक्ष
बन गया
फिर भी सब अपने में खोये
नागफनी उग रही
बाग में
कहते फूलों की क्यारी है।

इतने  खंडहर  उगे  शहर  में
वीराने भी मात हो गये
उगे प्रश्न गूँगे
होठों पर
शब्दों पर आघात हो गये
बहुत देर तक चुप
रहना भी
कुछ कहने की तैयारी है

१३ दिसंबर २०१०

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