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अनुभूति में डॉ. मधु प्रधान की रचनाएँ-

नये गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में

प्यासी हिरनी
सुमन जो मन में बसाए

गीतों में-
प्रीत की पाँखुरी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
सुलग रही फूलों की घाटी

अंजुमन में-
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
लबों पर मुस्कान

  सुलग रही फूलों की घाटी

प्रीति की
पाँखुरी छू गयी बाँसुरी
गीत झरने लगे स्वप्न तिरने लगे

साँस में
बस गया गाँव इक, गन्ध का
दे के सौरभ गया पत्र अनुबन्ध का
प्राण झंकृत हुये तार कुछ अनछुये
राग अनुराग मय
पल ठहरने लगे

चन्द्रमा को
मिली रुप की पूर्णिमा
नेह के मंत्र रचने लगी उर्मियाँ
थरथराते अधर गुनगुनाते प्रहर
शून्यता को प्रणव
शब्द भरने लगे

लो विभासित
हुयी कोई पावन व्यथा
योग संयोग की नव चिरन्तन कथा
मौलश्री छाँव में शिंजनी पाँव में
शुभ सृजन के नये
स्वर सँवरने लगे 

१३ दिसंबर २०१०

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