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अनुभूति में 'साग़र' पालमपुरी की रचनाएँ-

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अपनी फ़ितरत
किस को है मालूम न जाने
खोये-खोये-से हो
ज़ेह्न अपना
सोच के ये निकले

अंजुमन में-
कहाँ चला गया बचपन
चिड़ियों के घोसले
जिसको पाना है
बेसहारों के मददगार
रात कट जाए
वो बस के मेरे दिल में भी

  ज़ेह्न अपना

ज़ेह्न अपना झंझोड़ कर देखो
खुद को दुनिया से मोड़कर देखो

सच हमेशा सपाट होता है
चाहे कितना मरोड़ कर देखो

ज़ालिमो! तुम कभी लहू अपना
बूँद भर ही निचोड़ कर देखो

जिन ग़रीबों के हो मसीहा तुम
ख़ुद को उन से तो जोड़कर देखो

मंज़िलें ख़ुद क़रीब आएँगी
साथ रहबर का छोड़ कर देखो

आइना तोड़ना तो आसाँ है
टूट जाए तो जोड़ कर देखो

अपने रंग-ए-ग़ज़ल से ही 'साग़र'!
रुख़ हवाओं का मोड़ कर देखो.

३ नवंबर २००८

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