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इक चाँद तीरगी में
इसी खातिर
बैठे हो जिसके खौफ़ से छुपकर
मेरे आगे

अंजुमन में-
कभी यकीन की दुनिया में
खुशफहमियों में चूर

भाव महफिल में
हवाओं के रुख

 

मेरे आगे

मेरे आगे बड़ी मुश्किल खड़ी है
मेरी शोहरत मेरे कद से बड़ी है

चले आओ कि सदियाँ हो चुकी हैं
तरस खाओ कि नर्गिस रो पड़ी है।

हवाओं में जो चिंगारी थी अब तक
वो अब जंगल के दिल में जा पड़ी है

कोई आतिशफिशाँ है दिल में मेरे
मेरे होंठो पे कोई फुलझड़ी है

तेरा जूता सभी सीधा करेंगे
तेरे जूते में चाँदी जो जड़ी है

उधर इक दर इधर इस घर की इज्जत
अभी दहलीज़ पे लड़की खड़ी है

मयंक आवारगी की लाज रखना
तुम्हारी ताक में मंजि़ल खड़ी है

१ नवंबर २०१७

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