अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में पं. विद्यारतन 'आसी'
की रचनाएँ—

अंजुमन में—
क्या मालूम
कौन है
तेरी शफ़कत
रास्ता
राह नहीं थी इतनी मुश्किल

 

रास्ता

रास्ता मुख्तसर नहीं होता।
थक गया हूँ सफ़र नहीं होता।

लोग लोगों से कब नहीं मिलते
कब बिछड़ने का डर नहीं होता।

घर तो होता है दिल के रिश्तों से
ईंट गारे से घर नहीं होता।

लोग दरिया बहाए फिरते हैं
हमसे दामन भी तर नहीं होता।

डूब जाता है जिस सफ़ीने का
नाखुदा मोतबर नहीं होता।

जिनको पाने की धुन नहीं होती
उनको खोने का डर नहीं होता।

बेठिकानों के सौ ठिकाने हैं
बेठिकानों का घर नहीं होता।

ये मुक़ाम और मैं कहां 'आसी'
मेहरबां तू अगर नहीं होता।

१६ मार्च २००६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter