अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में सतपाल ख़याल की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
क्या है उस पार
जब इरादा
जाने किस बात की
दिल दुखाती थी
बदल कर रुख़

अंजुमन में-
इतने टुकड़ों में
लो चुप्पी ली साध

 

 

  दिल दुखाती थी

दिल दुखाती थी जो पहले, दिल को रास आने लगी है
अब उदासी रफ़्ता-रफ़्ता दिल को बहलाने लगी है

फिर मचल उट्ठी तमन्ना देखकर रंगीन मंज़र
फिर ये तितली कागज़ी फूलों पे मंडराने लगी है

अब उडेगी धीरे-धीरे फूल और पत्तों से शबनम
पौ फुटी है, दिन चढ़ा है, रात ढल जाने लगी है

लोक गीतों सी मिठास और गाँव की सी सादगी है
अब नई रंगत मेरे अशआर पर आने लगी है

क्यों जला रक्खा है मिट्टी के चराग़ों को 'ख़याल' अब
देख तो इन खिड़कियों से चाँदनी आने लगी है

२२ मार्च २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter