अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सोनरूपा विशाल की रचनाएँ-

अंजुमन में-
अपनी ये पहचान
ज़रूरी है
पिता
माँ
सुब्ह फूलों से रात तारों से



 

'

जरूरी है

मेरे जज़्बात को स्याही का रँग मिलना ज़रूरी है
मुझे रहना हो गर ज़िंदा, तो फिर लिखना ज़रूरी है

फकत अशआर लिखने से गिले शिकवे न कम होंगे
इन्हें दिल से मिटाने को, कभी मिलना ज़रूरी है

न होगा इस तरह कीमत का अंदाज़ा तुम्हें अपनी
किसी दिन बैठ के बाज़ार में बिकना ज़रूरी है

मेरी मसरूफियत में साथ देता है भले सूरज
तलब में चाँद के भी जागते रहना ज़रूरी है

पिता मेरे समंदर थे, ग़ज़ल और गीत के, बेशक
तो थोड़ा इल्म उनका भी, मुझे मिलना ज़रूरी है

१५ जुलाई २०१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter