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नई रचनाओं में-
उनकी दर्द मेरी जुबान
चेतावनी
लाठी

वह किस्सा ही क्या जो चलता न रहे।

बालगीतों में-
उत्तर उत्तर प्रश्न प्रश्न है
किसको भैया कब है भाया
छोटी छोटी बातों पर
दादा की मूँछों से
हवा हिलाती

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आए भी तो
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सबक
जीवन

क्षणिकाओं में-
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संकलन में-
जग का मेला- चीं चीं चूं चूं

 

उनका दर्द-मेरी जुबान

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी
शायद वह आतंकवादी भी नहीं हॆ
जो भून डालता हॆ महज भूनने के लिए
जिसके पास हॆ भी कोई समझ या दॄष्टि -
संदेह ही बना रहता हॆ।

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी
शायद यह हॆ
कि हमारे ही सामने, हमारे ही मुहल्लों में
हमारी ही समझ की छतों के नीचे
हमारे दर्दों को भी हमारा नहीं रहने दिया जाता।
बस छीन लिया जात हॆ हमसे -
न कोई कीमत, न कोई मुआवजा !

कॆसी त्रासदी हॆ न
होते ही उनका
हमारा दर्द हमें भी पहचानने से ईंकार कर देता हॆ -
ओपरा ओपरा होकर आंखें चुराता हॆ।
लगता हॆ घूमने बड़ी बड़ी गाड़ियों में बड़े घर के कुत्तों सा
कहां-कहां तक पहुंच नहीं हो जाती -
क्या इमारतें ऒर क्या बड़े-बड़े होटल।
कुर्सी मेज़ों पर खाने उड़ाता हॆ।

कोई कान तक नहीं देता था जिनकी ऒर
अब देखिए ऒकात उनकी -
कितना बड़ा अभिनेता हो गया हॆ -
निकल निकल भोंपुओं से
कॆसा रंग जमाता हॆ।
उसके दर्दीले ठुमकों पर
पूरी दुनिया नागिन सी झूमती हॆ।

हमारा दर्द
जो हमें भिखारी तक बना देता था
पहुंचते ही मंचों पर
हमें दाता की मुद्रा में ला देता हॆ।
ऒर कवच ओढ़े हमारे दर्दों के वे
(जिनके नाम लेने तक में खतरा हॆ हमें )
हमारी त्रासदी के देवता बन बॆठते हॆं।
ऒर हम ?
हमें तो पता ही नहीं चलता
कब क्या हो जाते हॆं हम।

हां, आहे-बगाहे
जाने क्यों लगने लगता हॆ
कि उनके भोंपू ही नहीं अन्दोलन भी
लादे अपने कंधों पर
उन्हें ही ढ़ोते हॆं।
ढ़ोते हॆं जॆसे ढ़ोते रहे हॆं अपनी मजबूरियां
अपनी भूख ऒर प्यास भी
ऒर डरों में लिपटा अपना गुस्सा भी।

क्या नहीं हॆ यह भी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी ?

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी तो यह भी हॆ
कि ताकत हॆ हममें
पर जीते हॆं ताकत की मुद्रा में।
हममें युद्ध हॆ
पर जीते हॆं युद्ध की मुद्रा में।
हममें गुस्सा हॆ
पर जीते हॆं गुस्से की मुद्रा में।
हम फेंक सकते हॆं उखाड़ कर
पर जीते हॆं उखाड़ फेंकने की मुद्रा में।
हममें समझ हॆ
पर जीते हॆं समझ की मुद्रा में।

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यह भी हॆ
कि हम महज बहस करते हॆं
ऒर वे उलझाए रखते हमें बहसों में जिन्हें वे आश्वासन कहते हॆं
हमारे मरने का इंतज़ार करते हॆं
ऒर एक दिन हम सचमुच मर जाते हॆं -
यानि उनके धॆर्य पर अपने अधॆर्य को कुर्बान कर देते हॆं
जबकि इच्छा उन्हीं की होती हॆ ऎसी, पर अदृश्य।

वे महज मुद्रा में होते हॆं बहस की, कहां समझ पाते हॆं!

हार-गिर कर
समझ पाते हॆं तो बस इतना ही-
’क्या जाता हॆ अपने बाप का
जो होता हॆ
होते रहने दीजिए।’

तो फिर बनते रहिए बेवकूफ
क्या जाता हॆ अपने बाप का भी।

२२ अगस्त २०११

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