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घरः दस भावचित्र

 

घर : दस भावचित्र

1
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं
घर हैं-  हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।

 2
आज मेरी
बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक
नीली छत तले।

3
चिटखती उन लकड़ियों की
गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर
लौटने को
हुलसता है मन बहुत।

4
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं
आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।

5
जब
विवशता हो गए
संबंध
तो फिर
घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे
प्रतिबंध
तो फिर
घर कहाँ?

6
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।

7
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।

8
घर रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।

9
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय! रास्ता दूजा नहीं।

10
साँसों की आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।

9 जुलाई 2007

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