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रक्त नीला

उँगलियों ने अभी - अभी ही तो
बुनी थीं
घास की एक अँगूठी
उँगली के आस पास
कि दिन
हवा की हथेली पर
धूप रख गया
भीड़ अपने रास्ते नापती
अँधेरे की पगडंडियाँ बनाती
चली जाती है ,
मिट्टी के ऊपर आई
पेड़ की जड़ों की नसें
बहुत बूढ़ी हो गई लगती हैं ,
पहाड़ तक
खाली हैं पठार
पंखों को पीठ के पीछे मिलाती
सर्राती चिड़िया
नदी किनारे लुढ़की गागर पर बैठ
गाती है बार - बार
एक कोई गीत
आकाश दोहराता है उसे
और पोर
समझ जाते हैं
कलम का तो
रक्त तक
नीला होता है ।

16 नवंबर 2007

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