अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में ललिता प्रदीप की रचनाएँ

छंदमुक्त में—
ज़िंदगी की अँधेरी सुरंग
थोड़ी कल्पना मेरी
पूरा भागीदार
भरोसे की कीमत
मेरी हिंदी... मेरी भाषा... मेरी माँ...

 

थोड़ी कल्पना मेरी

कभी सोचा है कि
अगर सूरज चला जाये
छुट्टी पर और
चाँद की तबीयत नाशाद हो जाये
हवाएँ रास्ता भटक जाएँ
और आदमियों की तरह दिशा न पूछे
नदियों का पानी उड़ जाए और
उन्हें सरकारी अस्पताल के मरीज जैसे
कोई सहायता न पहुँच पाए
समुन्दर सभी हड़ताल कर दे कि
उन्हें आसमान पर अब बहने का लाइसेंस
दे दिया जाये...
पेड़ पौधे बोलें कि
अब उनसे जड़ो का बोझ उठाया नहीं जाता
तारे कहें कि अब उनकी चमक
धीमी हो चली है ड्राईक्लीन चाहिए
पीले-झडे़ पत्ते बोलें कि
मुझे फेविकोल से चिपकाओ वापस
हवाओं को ट्रेन चाहिए हो...
दरिया को प्लेन चाहिए हो...
तो तो तो ...
हम सब क्या करेंगे...
सोचो सोचो सोचो...

२ मई २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter