अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में नीरज शुक्ला की रचनाएँ -

कविताओं में--
एक नीली नदी
कृष्ण विवर सी
बदलते परिवेश
शब्दों को

हाइकु में--
नीरज के हाइकु

संकलन में-
प्रेमगीत-- प्रेम


  कृष्ण विवर सी

कृष्ण विवर सी उसकी
खामोशी में
समाया जा रहा है
मेरा अस्तित्व।
निश्छल, शांत भाव मुद्रा
सी स्थिर है वह
ज्यों निर्जन श्मशान में
तपस्यारत कोई साधिका।
बींध रहा है उसका
अनजाना आकर्षण मुझे
निर्जन उपत्काओं में
कानाफूसी की तरह।
छा रही है वह मुझ पर
जैसे सुदूर अँचल से
आती हुई कोई आँधी।
विलीन हो रहा हूँ मैं
उसकी धुँध में
नए जीवन के लिए।
मैं फिर मिलूँगा
परिवर्तन के साथ
और मेरा नाम प्रभात होगा।

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter