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अनुभूति में प्रदीप कांत की रचनाएँ-

कविताओं में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

 

  कितने ही राम

सर्द फर्श की तरह
ठंडा शहर

जहाँ की तहाँ
जम-सी गई हैं
भावनाएँ

दिलों और दहशत के बीच
ठिठक से गए हैं
सम्बन्ध

भूख बहल रही है
प्रशासनिक डंडों से
और मुहल्ला छाप आक्रमणों से
कितने ही राम

और मजबूर मैं!
बन्द दरवाज़े पर
आस्थाएँ पढ़ने को

 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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