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अनुभूति में प्रदीप कांत की रचनाएँ-

कविताओं में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

 

  शब्द पक रहे हैं

सुना है
शब्द पक रहे हैं

ज़मीन के उस टुकड़े पर
जो घिरा है
बन्दूकों के साये से
हाँ
शब्द पक रहें हैं

शब्दों का पकना भी
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है
फसलों के पकने की तरह

किन्तु
फर्क है दोनों में बहुत

सदियाँ बीत जाती है
तब कहीं जाकर
पकते हैं शब्द

 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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