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नई कविताएँ
प्रार्थना होता जीवन
भूख और सूरज
ममत्व से दूर
लौटती जनता
स्त्री
हमारा चाहने वाला
हां ना के बीच

गीतों में-
गूंजे कूक प्यार की
नागार्जुन के महाप्रयाण पर
पाकशाला का गीत
सपनों में सतपुड़ा
सिसक रही झुरमुट में तितली

कविताओं में-
इन दिनों
गर्भगृह तक
गांव आने पर
निश्चय ही वहां
महक
मां की याद
मिल बांटकर
सतपुड़ा और उसकी बेटी नर्मदा
हथेलियां

हाँ ना के बीच

हाँ ना के बीच
फँसा विचार
अविकसित कली जैसा
अपने ही वृत्त पर सूखता है

हाँ ना के बीच
फँसी इंसानियत
हर जगह निस्तेज
और बाँझ होती है

हाँ ना के बीच
फँसा मौसम
हर जगह
पतझर-सा खड़खड़ाता है

हाँ ना के बीच
फँसा सृजन
हर जगह
रेत ही रेत बिछाता है।

16 मई 2007


 

 

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