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अनुभूति में प्रेम शंकर रघुवंशी की रचनाएँ-

नई कविताएँ
प्रार्थना होता जीवन
भूख और सूरज
ममत्व से दूर
लौटती जनता
स्त्री
हमारा चाहने वाला
हां ना के बीच

गीतों में-
गूंजे कूक प्यार की
नागार्जुन के महाप्रयाण पर
पाकशाला का गीत
सपनों में सतपुड़ा
सिसक रही झुरमुट में तितली

कविताओं में-
इन दिनों
गर्भगृह तक
गांव आने पर
निश्चय ही वहां
महक
मां की याद
मिल बांटकर
सतपुड़ा और उसकी बेटी नर्मदा
हथेलियां

सतपुड़ा और उसकी बेटी नर्मदा

तुम्हारी ठोस चट्टानें
धरती के
आदिम अस्तित्व का प्रमाण दे रही हैं
पेड़-पौधे-लताएँ
घास-फूस
कोमल रोएँ हैं तुम्हारे
और साँवला शरीर
कहानी है फौलादी
इसी कहानी को
आकार देने के लिए
जुटे हैं मजदूर
अपना खून-पसीना एक करते-खदानों में
नर्मदा!
तू इस कदर चिंघाड़ क्यों रही है?
जबकि पूरा पहाड़
तुझमें ही देख रहा है अपना चेहरा
इतने बड़े आसमान के नीचे
वे लोग
जो सतपुड़ा के संग साथ जन्मे थे
आज भी
अपनी संतानों के साथ नंगे हैं
पहाड़ में बोते हुए दु:ख
जिसे अपना
आनंद मान लिया है इन्होंने
ये कब तक
मेमनों की तरह पीते रहेंगे
चीतों की गुर्राहटें?
कब तक बने रहेंगे बुत?
कब रगड़ेंगे पत्थरों को आपस में
कि जिनसे-
अंधेरी गुफाओं के भीतर
जन्म ले उजाला
कब होगी
तेरी धार
चाकू छुरी गुप्ती या तलवार की तरह।

1 मई 2006

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