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अनुभूति में राजर्षि अरुण की रचनाएँ

जानना चाहता हूँ
तुम भी क्या करो
तुम्हारे जाने के बाद
नारी पत्ती जैसी होती होगी
मेरा कनकौआ
सपने में और बाहर तुम
समय की पीड़ा

 

नारी पत्ती जैसी होती होगी

नारी पत्ती जैसी होती होगी
या पत्ती नारी जैसी
अन्यथा
किसी मज़बूत आधार पर
अपने अस्तित्व का समर्पण
या कि
किसी कोमल भाव से
दुलार की आकांक्षा
या कि
अपने लुभावने लावण्य से
चहुँओर रस भर देना
या कि
पूरे परिवार की क्षुधातृप्ति करना
या कि
तूफ़ानी संकटों को सहना
या कि
समय के साथ
पीले पड़कर बिखर जाना
पर अंततः
अनेक-अनेक रूपों में
अपनी उपयोगिता का दान
सदा से
दोनों की नियति में
नहीं होता!

16 मार्च 2007

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