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यमुना तट पर छठ

 

 

 

यमुना तट पर छठ

इस नदी की साँसें लौट आई हैं
इसकी त्वचा मटमैली है
मगर पारदर्शी है इसका हृदय
इसकी आँखों में कम नहीं हुआ है पानी

घुटने भर मिलेगा हर किसी को पानी
लेकिन पूरा मिलेगा आकाश
छठव्रतियों को

परदेश में छठ करते हुए
मन थोड़ा भारी हो रहा है
महिलाओं का

दिल्ली में बहुत दूर लगती है नदी
सिर्फ़ गन्ने के लिए
या सिंघाड़े के लिए
लंबा सफ़र तय करना पड़ता है

अपना घर होता
तो दरवाज़े तक पहुँचा जाता कोई सूप
गेहूँ पिसवा कर ला देता
मोहल्ले का कोई लड़का
मिल-बैठ कर औरतें
मन भर गातीं गीत

गंगा नहीं है तो क्या हुआ
गाँव की छुटकी नदी नहीं है तो क्या हुआ
यमुना तो है
हर नदी धड़कती है दूसरी नदी में
जैसे एक शहर प्रवाहित होता है
दूसरे शहर में

पर सूरज एक है
सबका सूरज एक

हे दीनानाथ!
हे भास्कर!
अर्घ्य स्वीकार करो

वह शहर जो पीछे छूट गया है
वह गाँव जो उदास है
वे घर जिसमें बंद पड़े हैं ताले
जहाँ कुंडली मारे बैठा है अँधेरा
वहाँ ठहर जाना
अपने घोड़ों को कहना
वे वहाँ रुके रहें थोड़ी देर

हे दिनकर!
यह नारियल यह केला यह ठेकुआ
सब तुम्हारे लिए है
सब तुम्हारे लिए।

24 जुलाई 2007

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