अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सविता मिश्रा की
रचनाएँ -

नयी रचनाओं में-
उन बच्चों के लिये
काश! ऐसा होता
घसियारिनें
बित्ता भर रोशनी
समुद्र के तट पर

छंदमुक्त में-
अप्पू
थोड़ी-सी जगह
बेखबर लड़की
याद
रह-रह कर

 

बेखबर लड़की

बसंत की हवाओं में लिपटी चाँदनी में डूबी
लड़की की आँखों में
गमक रहे सपनों को
पढ़ रहा है
आकाश में टहलता चाँद
गौने के इंतजार में
आँगन में खिली चाँदनी में
बरतन माँजती लड़की
रह-रह कर मुस्कुरा उठती है
गुनगुनाती है गीत
हो उठती है बेसुध सी
और धुले बरतनों के साथ
समेट कर रख देती है
बिना धुले बरतन
माँ तरेर रही है आँखें
खिल रही है आँगन में चाँदनी
सपनों में डूबी लड़की
आँगन बुहार रही है
रात को सुबह समझ कर
चाँद हँस रहा है उस पर
माँ तरेर रही है आँखें
पर सबसे बेखबर लड़की
डूबी है सपनों में
हुलस रही है मन ही मन।

२ जून २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter