अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में श्यामल सुमन की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
अभिसार ज़िंदगी है
कभी जिन्दगी ने
जीने की ललक
मैं डूब सकूँ

अंजुमन में-
बच्चे से बस्ता है भारी
बाँटी हो जिसने तीरगी
मुझको वर दे तू
मुस्कुरा के हाल कहता
मेरी यही इबादत है
रोकर मैंने हँसना सीखा
रोग समझकर
साथी सुख में बन जाते सब
हाल पूछा आपने

कविताओं में-
आत्मबोध
इंसानियत
एहसास
कसक
ज़िंदगी
द्वंद्व
दर्पण
फ़ितरत 
संवाद
सारांश
सिफ़र का सफ़र

दोहों में-
दोहों में व्यंग्य
नेता पुराण

  चेतना
(चार मुक्तक)

कहीं बस्ती गरीबों की कहीं धनवान बसते हैं।
सभी मजहब के मिलकर के यहाँ इन्सान बसते हैं।
भला नफरत की चिन्गारी कहाँ से आ टपकती है,
जहाँ पर राम बसते हैं वहीं रहमान बसते हैं।

करे ईमान की बातें बहुत नादान होता है।
मिले प्रायः उसे आदर बहुत बेईमान होता है।
यही क्या कम है अचरज कि अभी तक तंत्र जिन्दा है,
बुजुर्गों के विचारों का बहुत अपमान होता है।।

सभी कहते भला जिसको बहुत सहता है बेचारा।
दया का भाव गर दिल में तो कहलाता है बेचारा।
है शोहरत आज उसकी जो नियम को तोड़ के चलते,
नियम पे चलने वाला क्यों बना रहता है बेचारा।।

अलग रंगों की ये दुनिया बहुत न्यारी सी लगती है।
बसी जो आँख में सूरत बहुत प्यारी सी लगती है।
अलग होते सुमन लेकिन सभी का एक उपवन है,
कई मजहब की ये दुनिया अलग क्यारी सी लगती है।।

२६ अप्रैल २०१०

 
 

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter