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गर्म हैं अख़बार

गर्म हैं अख़बार की सब सुर्खियाँ
घूमने लायक कहाँ हैं वादियाँ

दीप की मानिंद ना बुझ पाएँगे
आएँ बेशक रोज़ ही ये आँधियाँ

आज इन्टरनेट है और सेल है
कौन लिखता है यहाँ अब चिट्ठियाँ

जब सच्चाई बोलने हम लग गए
शर्म से गड़ने लगीं कुछ हस्तियाँ

जो भँवर से लड़ सके हर दौर में
ढूँढ़ ‘सुषमा’ आज ऐसी कश्तियाँ

४ फ़रवरी २००८ 

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