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प्रार्थना का वक्त
पत्थर होती दुनिया
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मेरा सरोकार मेरा संवाद
मेरा होना न होना
सपनों के बीच वह
समर्पण
सुलझी हुई
पहेली

 

ग़ायब होती एक तस्वीर

जब कभी
मुलाक़ात का एक सिरा थाम कर
तुम्हारी ओर आने की भरपूर कोशिश की
तब भ्रम का जाल इतनी दूर तक
फैला हुआ मिला
उसमें तुम्हारी तस्वीर
धुँधली और धुँधली
होती चली गई
अंत में हुआ यह की
तुम तस्वीर से ग़ायब हो गए।

फिर जब भी पाँव हरकत में आए
तो तुम्हारी तरफ़ की सभी
पगडंडियाँ फिसलन भरी
लंबी और दुरूह थी कि
कदम रखने के सारे प्रयास विफल हो गए।

हँसती हुई छवि तुम्हारी
समा गई
दीपक की उदास पीली लौ में।
मेंरे बस में हमेशा की तरह कुछ नहीं था
मैंने देखा,
सपनों का मुरझा जाना
खुशबुओं का अपने पुराने रास्ते को बदल लेना।
जीवन राग का वो सभी धुनों का भूल जाना
जिनके भरोसे
इसी दुनिया में एक दुसरी
समानांतर दुनिया बसाई जाती है।

1 सितंबर 2007

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