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अनुभूति में चंद्रमोहन भंडारी की रचनाएँ-

आपकी तारीफ़
कहो मैं मेरा कैसे?
कैसा ज़माना आया यारो!
खुदाई
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे वतन

 

मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे वतन

सात रंगों के गुल, एकता के चमन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे प्यारे वतन।

जहाँ आस्माँ चूमता है तेरे कदम
बाहें तेरी लुटाती प्यार का आलम
तेरी अजमत संसार में होगी न कम
तेरी खुशबू रहे अंजुमन-अंजुमन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे प्यारे वतन।

वेदमंत्रों, सबदों, आयतों का इज़हार है
गौतम, कबीर, नानक सम व्यवहार है
हर भाषा, वर्ण, धर्म तुझ पर वारा है
स्वावलंबी, समाजवादी, सहकारी अमन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे प्यारे वतन।

गीत, दोहे, ग़ज़ल, नज़म दर्पण तेरे
सूर, तुलसी, निराला, टैगोर, सरोजनी
महादेवी, मीर-ग़ालिब, बच्चन फनकार तेरे
कोने-कोने में खिले अदब के अनगिनत सुमन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे प्यारे वतन।

बदलता समय ग्लोबलाइज़ेशन पर ज़ोर है
जिसकी लाठी उसकी भैंस का भी शोर है
यू.ए.ई. - भारत बहुमुखी मैत्री बेजोड़ है
दुनिया की हर तरक्की में साक्षी हैं हमवतन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे प्यारे वतन।

तेरी तहज़ीब दुनिया में मशहूर है
तुझसे जो दूर है कितना मजबूर है
तेरी हर एक अदा और नूर पर हमको नाज़ है
सत्य अहिंसा पर अटल रहे तेरा चलन
मेरे हिंदोस्ताँ, मेरे वतन।

16 अप्रैल 2007

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