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किस लिये
दबे पाँव
रंग सुरों से

अंजुमन में-
अँधेरे बहुत हैं
तन कुचला
नाम गंगा बदल दो
फूल बेमतलब खिले
यह कैसा सन्यास
सच मुखों का यार

लंबी ग़ज़ल-
दिल्ली के सौ रंग

दोहों में-
नया नीति शतक



किस लिये

किस लिये रहने लगी हिन्दी बहुत बीमार-सी
डाक्टर ने दी विदेशी चीज़ ख़ुश्बूदार-सी

यह चली कैसी हवा पत्ते सभी के झ़ड़ गये
माँग पेड़ों ने न की थी आपसी संहार-सी

प्यार से जिसको रखा दिल ने बनाया धड़कनें
भागकर आई पराई लग रही वह नार-सी

सोचता है भक्त देवी पर चढ़ाऊँ किस तरह
फूल देसी और माला प्यार के व्यापार-सी

खिड़कियाँ हैं बंद लेकिन साँस फिर भी चल रही
मिल रही उसको हवा बासी व बदबूदार-सी

सर्दियों में जाएँ कैसे धूप छत पर सेंकने
सीढ़ियाँ ख़ुद बन गईं किरचों भरी दीवार-सी

वह इमारत है पुरानी और सुनते हैं बड़ी
पर न जाने दिख रही है क्यों गिरी मीनार-सी

दूर भाषा के सभी संकट हुए इस ढंग से
पूँछ लम्बी की सभी ने अहम् के विस्तार-सी

माँ गँवारिन है हमारी बाप से बेटे कहें
मेम होती बोलती इंग्लिश फ़राटेदार-सी

बात इंग्लिश में करो ‘गौतम’ कि हिन्दी बच सके
अन्यथा हो जायेगी बेशर्म यह बाज़ार-सी

१७ अक्तूबर २०११

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