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अनुभूति में कृष्ण बिहारी की रचनाएँ -

गीतों में—
आवारा मन
कितने तूफ़ानों से
कुछ न कहूँगा
गीत गुनगुनाने दो
तुम आए तो
तुम साथ चलो
दिल हँसते हँसते रोता है
दूर न जाते
देवता मैं बन न पाया
प्रीत- नौ चरण
राह जिस पर मैं चलूँ
रुपहले गीत का जादू
वही कहानी
साथ तुम्हारे
स्मृति

संकलन में—
ज्योतिपर्व–    चाँदनी की चूनर ज़मीं पर है
         –  मत समझो पाती
जग का मेला– झरना

 

आवारा मन

चंदन के वृक्षों की
खुशबू में डूबा मन
शायद मन राधा है
या फिर है वृंदावन

मन में क्या झूम उठी
अंग-अंग चूम उठी
तन में फिर यौवन की
आँधी-सी घूम उठी

पागल-सा फिरता है
अब तो बंजारा मन
आख़िर क्यों इतना है
दुश्मन आवारा मन!

दूर कहीं कली खिली
नयन-नयन धूप ढली
लहरों के पंखों पर
अधरों की प्यास चली

चलो चलें और छुएँ
सागर का खारा मन
अपनी ही चाहत से
हारा बेचारा मन

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