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अनुभूति में कृष्ण बिहारी की रचनाएँ -

गीतों में—
आवारा मन
कितने तूफ़ानों से
कुछ न कहूँगा
गीत गुनगुनाने दो
तुम आए तो
तुम साथ चलो
दिल हँसते हँसते रोता है
दूर न जाते
देवता मैं बन न पाया
प्रीत- नौ चरण
राह जिस पर मैं चलूँ
रुपहले गीत का जादू
वही कहानी
साथ तुम्हारे
स्मृति

संकलन में—
ज्योतिपर्व–    चाँदनी की चूनर ज़मीं पर है
         –  मत समझो पाती
जग का मेला– झरना

 

देवता मैं बन न पाया

मोड़ कर मैं राह अपनी
छोड़ कर हर चाह अपनी
अब अकेला चल रहा हूँ कारवाँ मैं बन न पाया।

जो मिला सीढ़ी समझकर
हो गया उस पार चढ़कर
बस बचाने में सभी को मर मिटा मैं बन न पाया।

मैं बुरा हूँ मानता हूँ मैं
यह हक़ीक़त जानता हूँ मैं
क्या करूँ मैं मित्र मेरे! देवता मैं बन न पाया।

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