अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में मीनू बिस्वास की रचनाएँ—

छंदमुक्त में—
आँचल की छाँव
क्या आँखें बोलती हैं
धुँधले अहसास
रिश्तों का ताना बाना
सृष्टि का सृजन

 

  सृष्टि का सृजन

कुछ अधखिली कलियों से पूछ रहा है
मुरझाया एक फूल
क्या तुम तैयार हो?
इस ज़ालिम दुनिया में
खिलने के लिए
सौभाग्य रहा तो
चढ़ा दिए जाओगे
ईश्वर के चरणों में
नहीं तो यों ही
मुरझा सूख जाओगे
इस डाली पे
विलुप्त अनगिनत लाशों की तरह
बेरहम कदमों तले
इन रास्तों पे
मसल दिए जाओगे
एक दिन मिट जायेगा
तुम्हारा भी वजूद
चुप चाप सुन रही थी
अधखिली कली
फिर चुपके से बोली
कैसे रोक पाएगी ये दुनिया
मेरी खुशबू को
जो निहित है मुझमें
खिलना तो मेरी नियति है
मेरे पराग में बसी है
सम्पूर्ण सृष्टि

२९ जून २०१५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter