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अनुभूति में
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जाग री
बीती विभावरी जाग री।
अंबर पनघट में डुबो रही-
तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का आँचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई -
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये,
तू अबतक सोयी है आली-
आँखों में भरे विहाग री। |