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जाग री
हिमाद्रि तुंग शृंग से
निर्वेद

संकलन में-
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मेरा भारत - अरुण यह मधुमय देश
प्रेमगीत- तुम कनक किरन

 

  जाग री

बीती विभावरी जाग री।

अंबर पनघट में डुबो रही-
तारा घट ऊषा नागरी।

खग कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का आँचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई -
मधु मुकुल नवल रस गागरी।

अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये,
तू अबतक सोयी है आली-
आँखों में भरे विहाग री।

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