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अनुभूति में श्रीकृष्ण सरल की रचनाएँ-

कविताओं में-
आँसू
छोड़ो लीक पुरानी
जवानी खुद अपनी पहचान
देश के सपने फूलें फले
देश से प्यार
धरा की माटी बहुत महान
नेतृत्व
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है
पीड़ा का आनंद
प्रेम की पावन धारा
मत ठहरो
मुझमें ज्योति और जीवन है
वीर की तरह
शहीद
सैनिक

  नेतृत्व

नेता, समाज को है नेतृत्व दिया करता
संकट आएँ, वह उनको स्वयं झेलता है,
वह झोंक नहीं देता लोगों को भट्टी में
खतरे आते, वह उनसे स्वयं खेलता है।

योग्यता अपेक्षित होती है हर नेता में
अपने समाज को सही दिशा में ले जाए,
पहचान समय की नब्ज़, सही निर्णय ले वह
ले सूझबूझ से काम, सफलता वह पाए।

नेतृत्व न रहता पीछे 'बढ़े चलो!' कह कर
नेतृत्व सदा आगे चल कर दिखलाता है,
नेतृत्व न खाता पीछे रह शीतल बयार
वह खाता तो, छाती पर गोली खाता है।

केवल कुछ लोगों को हाँके, नेतृत्व न वह
अपने समाज को दिशा-दान वह देता है,
नेतृत्व न देता लच्छेदारी बातों को
निज आन-बान के लिए जान वह देता है।

पिछलग्गू पैदा कर लेना नेतृत्व नहीं
नेतृत्व नहीं हू-हू कर पत्थर फिकवाता,
नेतृत्व देश के दीवाने पैदा करता
नेतृत्व, लाठियों से अपने सिर सिकवाता।

नेतृत्व देखता देश, देश की खुशहाली
नेतृत्व नहीं देखता स्वयं को, अपनों को,
नेतृत्व, हमेशा खुदी मिटा कर चलता है
पालता नहीं आँखों में सुख के सपनों को।

१६ जून २००५

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