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नए गीतों में-
कड़ी धूप में
कुछ भी बदला नहीं
राजा रहा नचा
सोनकली

गीतों में-
आँख दिखाई है
कठिन समय है
किसी की याद आई
खत मिला
गीत छौने
जोड़ियों को तो बनाता है सदा रब
दूर ही रहो मिट्ठू

पितृपक्ष में
भूल की
यह मत पूछो
रस्मी प्रणाम से

संकलन में-
तुम्हें नमन- क्षमा बापू


 

 

दूर ही रहो मिट्ठू

आकर्षक, आभामय, बना खरे सोने का
लेकिन मत मोह में बहो मिट्ठू
पिंजरे से दूर ही
रहो मिट्ठू

पिंजरे में झूला है, दाना है-पानी है
आस-पास आठ पहर, राजा है-रानी है
लेकिन सुख-सुविधा के
लालच में पड़े अगर
साँस-साँस जीवन की, गिरवी हो जानी है
अवसर आ जाये तो-स्वाभिमान की खातिर
भूख और प्यास भी सहो मिट्ठू
पिंजरे से दूर ही
रहो मिट्ठू

कोठी में जीने का अलग ढब-सलीका है
सब कुछ मिल सकता है, हाँ! मगर तरीका है
जंगल की षट-ऋतुओं,
मुक्त पवन, खुले गगन,
आम, बेर, महुए के आगे सब फीका है
राम-राम कहने से मुक्ति अगर मिलती है
डालों पर बैठकर कहो मिट्ठू
पिंजरे से दूर ही
रहो मिट्ठू

२५ फरवरी २०१३

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