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अनुभूति में ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की रचनाएँ -

अंजुमन में नयी ग़ज़लें-
अपना-अपना मधुकलश
चाँद बनाकर
जहाँ चलना मना है
धर्मशाला को घर
फूल के अधरों पे
 

गीतों में-
कहाँ पे आ गए हैं हम
जैसे हो, वैसे ही
सात्विक स्वाभिमान है
गीत कविता का हृदय है

  caaMd banakr

caaMd banakr vaao maorI AaMKaoM maoM ijasa pla Aa gayaa
yaaoM lagaa jaOsao ik idla pr caaMdnaI barsaa gayaa

yao khUMgaa vaao khMUgaa saaocakr inaklaa magar
doKkr ]nakao naja,r ko saamanao Gabara gayaa

Pyaar @yaa hO @yaa nahIM maOMnao kBaI saaocaa nahIM
jaba imalaI ]nasao naja,r tao Pyaar krnaa Aa gayaa

hma qao #vaabaaoM ko jahaM maoM dUr hr saccaa[- sao
ijaM,dgaI kI hr hkIkt kao hmaoM samaJaa gayaa

maOMnao prvaa kI nahIM AaiSak kBaI AMjaama kI
Pyaar maoM ]sako ja,maanao Bar sao maOM Tkra gayaa

16 jaulaa[- 2006

 

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