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अनुभूति में विप्लव जी की रचनाएँ-

गीतों में-
गोधूलि निकट
गोधूलि वेला
जीवन की शाम
झरनों जैसे बैन
रूह चाहती गात
 

  झरनों जैसे बैन

देवदार के वन में खोई प्रीत पुकार
प्रेम मंत्र जपती हो तपसिन बनी बयार
उसमें मंदिर पावन
घनी छाँह सा प्यार
  
ऊहापोह संकेतों जटिल सभी के अर्थ
निष्ठुर मुद्रा झूठी उलझ रहा मन व्यर्थ
मनोभाव पथरीले
ज्यों इनमें जलधार
 
परिचय तो झलकाते बतला देते नैन
चीड़ वृक्ष के जंगल झरने जैसे बैन
मौन बर्फ का पिघले
जगे स्वप्न संसार
 
१ अप्रैल २०२३

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