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पत्ता और बुलबुला

जीवन की आपाधापी में
एक पत्ता हूँ मैं।
सूखा हुआ-सा, मुरझाया-सा,
पेड़ से गिरा हुआ।
अस्तित्व विहीन-सा।
उड़ता हूँ
कभी इधर, कभी उधर।
यत्र-तत्र।
उड़ा ले जाती हैं आँधियाँ
न जाने किधर।
राह भूला हूँ,
खोया हूँ,
भटका हुआ हूँ।
जीवन की आपाधापी में
एक पत्ता हूँ।

इस जीवन के महासमुद्र में
एक बुलबुला हूँ मैं।
अकेला नहीं, सैंकड़ों हैं मेरे जैसे।
बहा जा रहा हूँ
अनंत समुद्र में।
अपने अस्तित्व के लिए
लड़ता हूँ लहरों से।
कभी ऊपर, कभी नीचे. . .
साँस की पराकाष्ठा तक. . .
दुर्बल-सी क्षणिक आभायुक्त
आशा के प्रति तक।
लड़ता रहता हूँ, और फिर खो जाता हूँ।
कि खो जाना ही नियति है।
और हो जाता हूँ विलीन इन्हीं पंचतत्वों में।
एक बुलबुला हूँ मैं
इस जीवन के महासमुद्र में।

9 मई 2007

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