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शाम और शहर

कटी पतंग की तरह
हमारी पहुँच से कहीं दूर
भागता हुआ समय।
रक्तिम आकाश की पंखुड़ियों के नीचे
हौले से बुलाए हमें।
दिल-ओ-दिमाग़ में
न होने का एहसास दे जाए।
शाम ढले।
फिर वही कंबख़्त एकाकीपन
नाचे सर चढ़कर।
फिर, वही बेतहाशा खो जाने का डर
लहु-लुहान कर जाए।

क्या यों ही कल भी
इस घर में अँधेरा होगा?
क्या किसी शाम भी
कोई न हमारा होगा?
ये मेरा दिल दिल नहीं
एक सूना शहर है।
कोई आता न जाता यहाँ।
स्पंदनहीन, भावहीन
इस शहर की इन सूनी गलियों को
नाम क्या दें हम?

9 मई 2007

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