अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अवतंस कुमार की रचनाएँ

नई कविताओं मे
अहसास
दरमियाँ
पैबंद
मैं और मेरी तनहाई

कविताओं में-
आज मुझे तुम राह दिखा दो
विवेक
शाम और शहर
पत्ता और बुलबुला

 

शाम और शहर

कटी पतंग की तरह
हमारी पहुँच से कहीं दूर
भागता हुआ समय।
रक्तिम आकाश की पंखुड़ियों के नीचे
हौले से बुलाए हमें।
दिल-ओ-दिमाग़ में
न होने का एहसास दे जाए।
शाम ढले।
फिर वही कंबख़्त एकाकीपन
नाचे सर चढ़कर।
फिर, वही बेतहाशा खो जाने का डर
लहु-लुहान कर जाए।

क्या यों ही कल भी
इस घर में अँधेरा होगा?
क्या किसी शाम भी
कोई न हमारा होगा?
ये मेरा दिल दिल नहीं
एक सूना शहर है।
कोई आता न जाता यहाँ।
स्पंदनहीन, भावहीन
इस शहर की इन सूनी गलियों को
नाम क्या दें हम?

9 मई 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter