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हूँ शायद

 

 

हूँ शायद

शुरुआत में
कई रास्ते थे
मेरे सामने,
कई संभावनाएँ,
इन्हीं में खोई रहती थी।

हाँ,
नहीं जानती थी मैं-
कहाँ जाता कौन सा रास्ता,
करना क्या हैं वहाँ।

और तुमने,
सहायता करने के लिए,
मुझे इस कोठी में पहुँचा दिया,
अब जानती हूँ मैं-
मुझे करना क्या हैं,
जानती हूँ मैं-
सफलता के प्रतिमान।
जानती हूँ मैं-
उठ रही हूँ ऊँची,
हर वर्ष।

पर आज
दर्पण में झाँकती
सोचती हूँ मैं-
संभावनाओं और इस प्रतिबिंब में जो भेद है,
उसे दूर कर पाऊँगी कभी?

सारा जीवन मेरा,
बचा हुआ,
लग जाएगा
इस खाई को भरने में,
शायद तब...

१२ मई २००८ 

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