अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में दीपिका ओझल की
रचनाएँ—

नई कविताएँ—
चंदा


 

कविताओं में-
काश
तुहिन की बूँद
दीया
मन का मनका
मैं पगली
सखी

 

चंदा

बचपन ने मेरे जिसको
पाने की ज़िद करी थी
वो चाँद आज मेरी
बदली पे आ गया है

तेरे दीदार की हसरत
लिए वर्षों थी मैं तो जागी
क्यों आज तेरा मिलना
पलकें भिगा गया है?

जिसके लिए मैंने
दिल के दिए थे बाले
वो आके आस के सब
दीपक बुझा गया है
क्यों आज तेरा मिलना
पलकें भिगा गया है?

अभिव्यक्ति समर्पित की
मैंने जिसे अपनी
उँगली के पोरों पे मेरी
गल्ती गिना गया है
क्यों आज तेरा मिलना
पलकें भिगा गया है?

उस ही के लिए मैंने
की थी बुलन्द इतनी
जो आज मेरी हस्ती
खुद ही मिटा गया है
क्यों आज तेरा मिलना
पलकें भिगा गया है?

३१ मार्च २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics