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अनुभूति में दिनेश पारते की रचनाएँ-

आह्वान
बढ़े चलो
इक आग लगा ली है
गानवी
जयघोष
मौन भंग
शुभ कामनाएँ

 

गानवी

उज्वल-उज्वल चिर पावन जल
उतरी लेकर निर्मल निर्झर!
बूँद-बूँद की श्वेत श्रृंखला
मिल जाती सतलज में आकर।

गगन तले दिख जाती सहसा
दूर कहीं से एक रेखा-सी।
झर-झर से झंकृत कर जाती
सात सुरों की सुर-कन्या-सी।

ना अथाह है, ना अपार है
ना यह यमुना, ना जाह्नवी।
प्रतिपल शीतल प्रतिपल चंचल
शक्तिदायिनी है यह गानवी।

24 मार्च 2007

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यह कविता मैंने गानवी जल विद्युत परियोजना, हिमाचल प्रदेश के भ्रमण के समय लिखी थी। गानवी एक सुंदर, छोटी-सी पहाड़ी नदी है जो किसी जलप्रपात की तरह सतलुज नदी में मिल जाती है। पहाड़ से कल-कल गिरती इस झरने की सुंदरता अद्वितीय है। विद्युत उत्पादन करने के कारण मैंने इसको शक्तिदायिनी कहा है।

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