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अनुभूति में दिनेश पारते की रचनाएँ-

आह्वान
बढ़े चलो
इक आग लगा ली है
गानवी
जयघोष
मौन भंग
शुभ कामनाएँ

 

मौन भंग

क्षितिज बन गई सांध्य दुल्हन-
ओढ़कर के लाल आँचल,
प्राचीरों ने भाल पर-
अपने सजाया स्वर्ण सेहरा,
तुम नि:शब्द - निर्वाक हो
और मौन मैं भी,
मंद झोंके ये हवा के
कर रहे हैं कुछ इशारे,
मेघकृष्णों के हिंडोले डोलते से -
रीझती-सी बिजलियाँ कुछ कह रही हैं,
हो रहा है दृश्य यह अनुपम प्रणय का -
तुम अगर कुछ गुनगुनाओ -
तोड़ दूँगा मौन मैं भी।
तुम अगर कुछ गुनगुनाओ तोड़ दूँगा मौन मैं भी।

24 मार्च 2007

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