अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में दिनेश पारते की रचनाएँ-

आह्वान
बढ़े चलो
इक आग लगा ली है
गानवी
जयघोष
मौन भंग
शुभ कामनाएँ

 

जयघोष

आक्रोश का सागर हृदय में- शौर्य की अभिव्यक्ति तन पर,
बढ़ चले लेकर तिमिर में- ज्ञानोज्वलित ज्वाला निरंतर,
राष्ट्र दीक्षा, राष्ट्र वीक्षा, राष्ट्र रक्षा के लिए -
मृत्यु का करके वरण फिर, हैं अमर वे वीर मर कर।

था शिला-सा वक्ष जिनका, लौह-सी जिनकी भुजाएँ,
हुँकार से जिनकी थी कंपित, अंबर धरा और दस दिशाएँ,
भीम-भाँति वे गदाधर, पार्थ के से वे धनुर्धर।
मृत्यु का करके वरण फिर, हैं अमर वे वीर मर कर।

राष्ट्र के संग्राम का जब नाद दिग्घोषित हुआ,
हिल उठा ब्रम्हांड सारा, काल भी विचलित हुआ,
राष्ट्र रक्षा का समर था मृत्यु का जैसे स्वयंवर।
मृत्यु का करके वरण फिर, हैं अमर वे वीर मर कर।

24 मार्च 2007

--------------------------------------
यह कविता मैंने गानवी जल विद्युत परियोजना, हिमाचल प्रदेश के भ्रमण के समय लिखी थी। गानवी एक सुंदर, छोटी-सी पहाड़ी नदी है जो किसी जलप्रपात की तरह सतलुज नदी में मिल जाती है। पहाड़ से कल-कल गिरती इस झरने की सुंदरता अद्वितीय है। विद्युत उत्पादन करने के कारण मैंने इसको शक्तिदायिनी कहा है।

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter