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अनुभूति में डॉ. जितेन्द्र वशिष्ठ
की रचनाएँ -

अंजुमन में-
आज फिर
त्योहारों के आने पर
बच्चों का दीवार पे लिखना
बस यों ही

  बस यों ही

बस यों ही खो जाएँगे हम एक दिन!
हादसा हो जाएँगे हम एक दिन!

लहर पर लिखे हरफ़ कब तक रहे -
लहर ही हो जाएँगे हम एक दिन!

ख्वाहिशों का काफ़िला रुकता कहाँ!
पस्त ही हो जाएँगे हम एक दिन!

रौशनी के गर हुजूमों पर गए -
तीरगी हो जाएँगे हम एक दिन!

फूल, पत्ते और तितली सब गलत -
खार बस हो जाएँगे हम एक दिन

 

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