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अनुभूति में डॉ. जितेन्द्र वशिष्ठ
की रचनाएँ -

अंजुमन में-
आज फिर
त्योहारों के आने पर
बच्चों का दीवार पे लिखना
बस यों ही

  त्योहारों के आने पर

त्योहारों के आने पर अब खौफ़-सा लगता है!
उनके पास बुलाने पर अब खौफ़-सा लगता है!

बहुत निभाए वादे हमने साथ निभाने के -
खुद से ही मिल जाने पर अब खौफ़-सा लगता है!

खुली सड़क पर रातों-रातों आवारा घूमे -
अपनी आहट पाने पर अब खौफ़-सा लगता है!

जब से उनकी जेब भरी है सोने-चाँदी से -
उनके घर तक जाने पर अब खौफ़-सा लगता है!

जब से हमको पता चला हम मोहरें है उनके -
उनके आँख हिलाने पर अब खौफ़-सा लगता है!

 

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